अब समर्पण पर ग्रहण
निश्चित ही, है लगने लगा।

नित्य परिचित था जो मन,
जिन प्रेम के,, पंक्षियों से....
उनके पर(पंख) अब वैरी कोई,,
व्याघ्र बन कुतरने लगा...।।

अब समर्पण पर ग्रहण
निश्चित ही, है लगने लगा।

हठ बना हथियार पल में,
सम्बन्ध के संहार का....
रिश्ते की जब डोर टूटी,,
जग भी दुश्मन लगने लगा...।।

अब समर्पण पर ग्रहण
निश्चित ही, है लगने लगा।।

छिड़ गई एक जंग मन में,
जीवन व्याकुल होने लगा....
इस विरह की आग में अब,,
साँस का बंधन भी झुलसने लगा।।

अब समर्पण पर ग्रहण
निश्चित ही, है लगने लगा।

_____©सुनिधि सिंह_____