जब लोग कहते हैं,, प्रेम....पूजा है ...

तो मन में चुभते असंख्य शूल चीत्कारते हुए कहते हैं ...
कि प्रेम एक अभिशाप है... एक पाप है

हाँ !! एक ऐसा अभिशाप.....
जिसने जीवन को मेरे बेरंग बनाया है...
जीते जी दोज़ख का एहसास दिलाया है...!!


और पाप इसलिए,, प्रेम क्योंकि इसने,
मेरे मासूम मन से छल करके इसे पत्थर बनाया है,,
मेरे हृदय की कोमल कली को इसने बिखराया है !!


चाह मुझे भी थी,, हरपल मुस्कुराने की,,
किसी के प्रेम में खुशनुमा,, जीवन बिताने की....

मग़र इस प्रेम ने ही मुझको बर्बाद किया है....
अश्क़ और ग़म का दरिया,, निगेहबान किया है।